Behaviour बिगड़ रहा है या बच्चा परेशान है? क्या वजह घर के झगड़े हैं?

children behaviour change due to behaviour conflict

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Abstract

रात के 11 बज रहे हैं। हॉल से दो तेज आवाजें गूंज रही हैं “तुम कभी मेरी बात नहीं सुनते!” और सामने से जवाब आता है, “तुम्हें तो कभी घर की फिक्र ही नहीं रही!”तभी बगल के कमरे में सोया हुआ बच्चा अचानक जाग जाता है। वह कुछ नहीं बोलता, बस अंधेरे में सहमा हुआ दीवार को देखता रहता है। उसके मन में सिर्फ एक ही डर है: “अब आगे क्या होगा?”पति-पत्नी के बीच पैसों, जिम्मेदारियों या parenting को लेकर ऐसी बहस होना normal बात है। लेकिन जब यह रोज़ की जंग बन जाती है, तो बच्चों के mind में क्या चल रहा होता है, इस पर हमारा ध्यान नहीं जाता।

हो सकता है बच्चा उस समय कुछ न बोले, पर उसे सब feel होता है। कुछ बच्चे डर जाते हैं, तो कुछ खुद को ही इस कलह की वजह मान बैठते हैं। रोज़-रोज़ का यह माहौल बच्चों की Emotional Security, Behaviour, पढ़ाई और उनके relationships को बुरी तरह affect करता है।

इस article में हम यही समझेंगे कि माता-पिता के झगड़े बच्चों की Mental Health पर क्या असर डालते हैं, अलग-अलग age groups के बच्चे इसमें कैसा react करते हैं और आप क्या कर सकते हैं ताकि बच्चे हमेशा safe feel करें।

Introduction

घर में कभी पैसों को लेकर बहस शुरू हो जाती है, तो कभी जिम्मेदारियों को लेकर। कभी बच्चों की पढ़ाई या Parenting पर भी माता-पिता की राय अलग हो सकती है। शुरुआत छोटी होती है, लेकिन धीरे-धीरे आवाजें ऊँची हो जाती हैं और गुस्से में ऐसी बातें निकल जाती हैं, जिनका बाद में पछतावा होता है।

लेकिन इस पूरी बहस के बीच अक्सर एक बात पर ध्यान नहीं जाता।

उस समय बच्चा क्या feel कर रहा होगा? 

हो सकता है वह चुपचाप किसी कोने में दुबक जाए, अपने कमरे में चला जाए या फिर झगड़ा रोकने की कोशिश करे। कई माता-पिता सोचते हैं कि बच्चा अभी छोटा है, उसे क्या समझ होगी? लेकिन बच्चे माता-पिता की आवाज़ और उनके Behaviour से माहौल का तनाव तुरंत पकड़ लेते हैं।

अब सवाल यह है कि क्या हर बहस बच्चे को नुकसान पहुँचाती है?

इसका जवाब जानने के लिए पहले यह समझना ज़रूरी है कि normal मतभेद और लगातार होने वाले Family Conflicts में क्या फ़र्क है।

क्या माता-पिता का हर झगड़ा बच्चों के लिए नुकसानदायक होता है?

दो लोग साथ रहेंगे, तो असहमति होना स्वाभाविक है। मान लीजिए, एक चाहते हैं कि बच्चा सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दे, जबकि दूसरे का मानना है कि उसे खेलने का भी समय मिले। ऐसी छोटी-मोटी असहमतियाँ लगभग हर परिवार में होती हैं और इसका मतलब यह नहीं कि रिश्ता खराब है। ऑस्ट्रेलिया के Raising Children Network के अनुसार, मतभेद होना normal है; ज़्यादा ज़रूरी यह है कि आप उन्हें handle कैसे करते हैं।

फिर झगड़े कब बच्चों के लिए परेशानी बन जाते हैं?

जब बात एक-दूसरे को नीचा दिखाने, अपमान करने या धमकियाँ देने तक पहुँच जाए, तब यह सामान्य बहस नहीं रहती। अगर ऐसा बार-बार हो और मसले कभी सुलझें नहीं, तो घर का माहौल हमेशा stressful रहने लगता है।

क्या माता-पिता की चुप्पी भी बच्चों को परेशान कर सकती है?

हाँ, बच्चों के लिए सिर्फ तेज़ आवाज़ ही नहीं, बल्कि झगड़े के बाद की चुप्पी भी उतनी ही दर्दनाक होती है। जब पति-पत्नी कई दिनों तक एक-दूसरे से बात करना बंद कर देते हैं, तो बच्चा भले ही वजह न जाने, पर वह इस खिंचाव को तुरंत feel कर लेता है। Psychology में इसे Hostile Silence (नाराज़गी भरी चुप्पी) कहा जाता है।

यहाँ एक अंतर समझना ज़रूरी है, गुस्सा शांत करने के लिए कुछ देर का break लेना गलत नहीं है, लेकिन दूसरे को सज़ा देने के लिए दिनों तक जानबूझकर बात न करना बच्चों को बुरी तरह affect करता है।

बच्चों के लिए Emotional Security इतनी जरूरी क्यों है?

एक बच्चे के लिए घर सिर्फ रहने या खाने-पीने की जगह नहीं होता, बल्कि यही वह जगह है जहाँ वह खुद को सुरक्षित महसूस करना सीखता है। उसे भरोसा होता है कि हर परेशानी में उसके माता-पिता साथ खड़े होंगे। लेकिन जब उन्हीं माता-पिता के बीच लगातार झगड़े हों, तो यह भरोसा टूटने लगता है। बच्चा हमेशा इसी डर में जीता है कि अगला झगड़ा कब होगा या कहीं उसके माता-पिता अलग तो नहीं हो जाएँगे।

Emotional Security Theory क्या कहती है?

Child Psychology में इसे समझाने के लिए एक Theory है, जिसे Emotional Security Theory कहा जाता है। Researchers Patrick Davies और E. Mark Cummings की Research के मुताबिक, बच्चे अपने परिवार में सबसे पहले सुरक्षा चाहते हैं। जब घर में लगातार stress रहता है, तो बच्चों को लगता है कि उनके परिवार की Stability खतरे में है। ऐसे में बच्चे माता-पिता के Behaviour को लेकर बहुत ज़्यादा alert रहने लगते हैं—जैसे यह नोटिस करना कि आज मम्मी-पापा किस मूड में बात कर रहे हैं।

क्या हर बच्चा झगड़े देखकर डर जाता है?

नहीं, हर बच्चे का reaction अलग होता है। कुछ बच्चे डर जाते हैं, कुछ गुस्सा ज़ाहिर करते हैं, तो कुछ बिल्कुल शांत और गुमसुम हो जाते हैं। यह सब बच्चे की उम्र, उसके स्वभाव और उसे मिलने वाले Emotional Support पर निर्भर करता है। यहाँ तक कि एक ही घर में रहने वाले दो भाई-बहन भी इस स्थिति पर बिल्कुल अलग तरह से react कर सकते हैं।

अलग-अलग उम्र के बच्चों पर माता-पिता के झगड़ों का क्या असर पड़ सकता है?

एक 3 साल का बच्चा और एक 15 साल का Teenager घर के झगड़ों को एक जैसा नहीं समझते। छोटा बच्चा शायद यह जान भी न पाए कि बहस किस बात पर है, वहीं बड़ा बच्चा वजह समझकर भी अंदर ही अंदर परेशान हो सकता है।

छोटे बच्चों पर क्या असर पड़ सकता है?

छोटे बच्चे अपनी परेशानी शब्दों में नहीं बता पाते। घर में लगातार stress रहने पर वे ज़्यादा रोने लगते हैं, हर समय माता-पिता से चिपके रहना चाहते हैं या ज़िद करने लगते हैं। उनकी नींद और Daily Routine भी बिगड़ सकता है। हालाँकि, हर बार रोने या ज़िद करने की वजह झगड़ा ही हो, ऐसा ज़रूरी नहीं; इसमें उनकी उम्र, सेहत और नींद का भी हाथ होता है।

School जाने वाले बच्चों पर क्या असर होता है?

इस उम्र के बच्चे घर की परेशानियों को बेहतर समझने लगते हैं। कुछ बच्चे स्कूल में भी घर की बातों को सोचकर परेशान रहते हैं, जिससे उनका पढ़ाई में मन कम लगता है। वे चिड़चिड़े हो सकते हैं या दोस्तों से दूरी बना लेते हैं। Raising Children Network के अनुसार, न सुलझने वाले झगड़ों के कारण बच्चों में उम्र के हिसाब से अलग-अलग Behavioural Changes दिख सकते हैं।

Teenagers पर क्या असर पड़ सकता है?

Teenage में बच्चे अपनी नई सोच बना रहे होते हैं। वे माता-पिता की दिक्कतों को समझते ज़रूर हैं, पर उन्हें handle नहीं कर पाते। कुछ Teenagers घर में कम समय बिताना पसंद करते हैं, बातचीत कम कर देते हैं या छोटी बातों पर बहस करने लगते हैं। कुछ मामलों में स्कूल से दूरी या Risky Behaviour जैसी परेशानियाँ भी दिख सकती हैं, पर हर Teenager ऐसा ही react करे, यह ज़रूरी नहीं।

Age GroupPossible Behavioural ChangesParents को क्या ध्यान देना चाहिए?
Young Childrenज्यादा रोना, जिद करना, चिपके रहनाBehaviour में अचानक बदलाव
School-Age ChildrenAnxiety, गुस्सा, पढ़ाई में मन न लगनाSchool Performance और दोस्तों के साथ Behaviour
Teenagersघर से दूरी, बहस, StressCommunication, Emotional Health और Safety

बच्चे माता-पिता के झगड़ों के लिए खुद को जिम्मेदार क्यों मानने लगते हैं?

कभी-कभी माता-पिता की बहस बच्चों की पढ़ाई या Parenting को लेकर होती है। एक कहता है, “तुम बच्चे पर ध्यान नहीं देते”, तो दूसरा जवाब देता है, “मैं अकेला कितना संभालूँ?” दोनों अपनी परेशानी बता रहे होते हैं, लेकिन पास बैठा बच्चा इसका कुछ और ही मतलब निकाल लेता है।

वह सोच सकता है, “अगर मैं अच्छे से पढ़ता, तो मम्मी-पापा नहीं लड़ते।” यहीं से बच्चा खुद को उस परेशानी का ज़िम्मेदार मानने लगता है, जिसे सुलझाना बड़ों का काम है। Psychology में इसे Self-Blame कहा जाता है।

बच्चे खुद को दोष क्यों देने लगते हैं?

बच्चों को पूरी Situation की जानकारी नहीं होती। वे कोई एक बात सुनकर अपने हिसाब से मतलब निकाल लेते हैं। अगर माता-पिता बच्चे को लेकर बहस करते हैं, तो उसे लगता है कि झगड़े की असली वजह वही है। ऑस्ट्रेलिया की Federal Circuit and Family Court के अनुसार, माता-पिता के बीच गंभीर Conflict बच्चों को तब सबसे ज़्यादा परेशान करता है, जब वे खुद को उसका ज़िम्मेदार मानने लगते हैं।

माता-पिता को बच्चे से क्या कहना चाहिए?

अगर बच्चे ने झगड़ा देखा या सुना है, तो उससे साफ़ शब्दों में बात करें। उसे भरोसा दिलाएँ: “मम्मी-पापा के बीच कुछ बातों पर मतभेद हैं, लेकिन इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। इसे ठीक करना हमारी ज़िम्मेदारी है, तुम्हारी नहीं।” हालाँकि, सिर्फ एक बार कहना काफी नहीं है; माता-पिता को अपने Behaviour से भी बच्चे को यह भरोसा दिलाते रहना होगा।

जब माता-पिता बच्चों को अपने झगड़ों के बीच ले आते हैं

कई परिवारों में जब पति-पत्नी आपस में बात नहीं करते, तो वे बच्चे को ज़रिया बना लेते हैं—”जाकर पापा से कह दो” या “मम्मी से पूछ कर आओ”। कभी-कभी तो बच्चे से ही पूछ लिया जाता है, “बताओ, हम दोनों में कौन सही है?” बड़ों को यह normal लग सकता है, पर बच्चे के लिए यह situation बहुत मुश्किल होती है।

Parent-Child Triangulation क्या होता है?

बच्चा माता-पिता दोनों से प्यार करता है। जब उसे किसी एक का पक्ष लेने को कहा जाता है, तो उसे डर लगता है कि दूसरा नाराज़ हो जाएगा। Child Psychology में इसे Parent-Child Triangulation या Feeling Caught कहा जाता है, जहाँ बच्चा खुद को माता-पिता के झगड़े के बीच फँसा हुआ महसूस करता है।

2026 की Research क्या कहती है?

2026 में Human Communication Research में पब्लिश एक Meta-Analysis में 49 Studies के data (कुल 23,336 participants) को परखा गया। Researchers ने पाया कि माता-पिता के Conflict और बच्चों के बीच में फँसा महसूस करने के बीच एक मीडियम लेवल का Positive Correlation (लगभग 0.40) है। इसका सीधा मतलब है कि जहाँ झगड़े ज़्यादा होते हैं, वहाँ बच्चों के बीच में पिसने की संभावना बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है।

माता-पिता को बच्चों से क्या नहीं करवाना चाहिए?

  • बच्चों को गुस्से वाले messages पहुँचाने का जरिया न बनाएँ।
  • उनसे पार्टनर की private बातें पता करने या किसी एक का साइड लेने को न कहें।
  • बच्चे के सामने पार्टनर की बुराई करने से बचें।
  • बच्चे का काम माता-पिता के बीच फैसला करना नहीं है, उसे दोनों के साथ safe और भरोसेमंद relationship बनाने का मौका मिलना चाहिए।

क्या बचपन में देखे गए झगड़े भविष्य के Relationships पर भी असर डाल सकते हैं?

बच्चे रिश्तों के बारे में सिर्फ हमारी सिखाई हुई बातों से नहीं सीखते। वे यह भी करीब से देखते हैं कि हम खुद अपने Relationships में कैसा Behaviour कर रहे हैं। जब किसी बात पर अनबन होती है, तो हम उसे कैसे Handle करते हैं? गुस्सा आने पर हम क्या करते हैं? अपनी गलती मानते हैं या सारा दोष हमेशा सामने वाले पर मढ़ देते हैं? बच्चे यह सब कुछ बहुत बारीकी से सीखते हैं।

अगर कोई बच्चा लंबे समय तक घर में ऐसा माहौल देखता है जहाँ लगातार अपमान या डर बना रहे, तो रिश्तों को लेकर उसका पूरा Perspective ही बदल सकता है। ऐसे बच्चों को आगे चलकर दूसरों पर Trust करने, अपनी Feelings खुलकर शेयर करने या पार्टनर के साथ मतभेदों को Handle करने में काफी मुश्किल आ सकती है।

लेकिन यहाँ एक बात समझना बहुत ज़रूरी है।

बचपन में माता-पिता के झगड़े देखने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि बच्चे के फ्यूचर Relationships हमेशा खराब ही होंगे। आगे चलकर ज़िंदगी में मिलने वाले अच्छे लोग, दोस्तों का साथ, अपनों का Support और लाइफ के दूसरे Positive Experiences भी बहुत बड़ा रोल निभाते हैं। इसलिए किसी भी बच्चे का आने वाला कल सिर्फ उसके बचपन के बुरे अनुभवों से तय नहीं किया जा सकता।

अगर माता-पिता अलग हो जाएँ, तो क्या बच्चों की परेशानी खत्म हो जाती है?

कई बार माता-पिता सोचते हैं कि अलग रहने से रोज-रोज के झगड़े खत्म हो जाएँगे और बच्चों को भी राहत मिलेगी। कुछ परिवारों में ऐसा होता भी है, लेकिन हर परिवार की Situation एक जैसी नहीं होती। अगर अलग होने के बाद भी माता-पिता एक-दूसरे को दोष देते रहें या बच्चों को अपने विवादों में शामिल करते रहें, तो बच्चों की परेशानी वैसी ही बनी रह सकती है।

Separation के बाद क्या ध्यान रखना चाहिए?

ऑस्ट्रेलिया की Federal Circuit and Family Court के अनुसार, Separation के बाद बच्चों को माता-पिता के बीच की दुश्मनी या विवादों में शामिल करना उनके लिए बहुत नुकसानदायक हो सकता है। बच्चों से दूसरे घर की जासूसी करवाना, उनके ज़रिए गुप्त Messages पहुँचाना या दूसरे पेरेंट से प्यार करने पर उन्हें दोषी महसूस कराना बिल्कुल ठीक नहीं है।

Co-Parenting का रोल और सम्मानजनक व्यवहार

जहाँ परिस्थितियाँ सुरक्षित हों, वहाँ माता-पिता का आपस में सम्मानजनक व्यवहार, बच्चे का एक तय Daily Routine और भरोसेमंद रिश्ते उसे बहुत बड़ा Emotional Support दे सकते हैं। इसे Co-Parenting के संदर्भ में भी समझा जा सकता है, जहाँ अलग रहने के बावजूद दोनों माता-पिता बच्चे की देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारियाँ मिलकर निभाने की कोशिश करते हैं।

सुरक्षा और प्यार सबसे ज़रूरी है

यह ज़रूरी नहीं है कि बच्चा तभी safe महसूस करेगा जब उसके माता-पिता एक ही घर में साथ रहते हों। उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वह जहाँ भी रहे, वहाँ उसे Safety, प्यार और ज़रूरी Support मिले।

(ध्यान रखें: अगर रिश्ते में Domestic Violence या Abuse शामिल है, तो साथ रहने, संपर्क रखने या बच्चे की देखभाल से जुड़े फैसलों में सबसे पहले Safety और कानूनी ज़रूरतों को ही ध्यान में रखना चाहिए।)

क्या माता-पिता को झगड़े सुलझाते देखकर बच्चे कुछ अच्छा भी सीख सकते हैं?

अब तक हमने जाना कि माता-पिता के झगड़ों का बच्चों पर क्या असर पड़ सकता है, लेकिन हर बहस का अंत गुस्से या नाराजगी में होना ज़रूरी नहीं है। कभी-कभी दो लोग किसी बात पर असहमत होते हैं, लेकिन फिर एक-दूसरे की बात सुनते हैं, अपनी गलती मानते हैं और मिलकर Problem का Solution निकालते हैं। बच्चे जब ऐसा Behaviour देखते हैं, तो उन्हें भी यह सीखने का मौका मिलता है कि रिश्तों में मतभेद होने पर उन्हें कैसे Handle किया जा सकता है।

Constructive Conflict क्या होता है?

इसका मतलब है कि जब दो लोगों की राय अलग हो, तब वे एक-दूसरे को गलत साबित करने के बजाय Problem समझने की कोशिश करें। ज़रूरत पड़े तो बातचीत थोड़ी देर रोक दें और गुस्सा शांत होने के बाद फिर उसी मुद्दे पर बात करें। इस तरह असहमति होने के बावजूद एक-दूसरे के लिए सम्मान बनाए रखा जा सकता है।

Research इस बारे में क्या बताती है?

2026 में Journal of Marital and Family Therapy में प्रकाशित एक Research Review में 23 Studies को देखा गया। इस Review में पाया गया कि जब माता-पिता सम्मानपूर्वक अपने मतभेद सुलझाते हैं, तो बच्चों में बेहतर Emotional Security, Social Problem-Solving Skills और कुछ मामलों में कम Behavioural Problems देखी जाती हैं। हालाँकि, इन Results पर दूसरे पारिवारिक और व्यक्तिगत कारणों का भी असर हो सकता है, इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि माता-पिता के शांतिपूर्ण तरीके से बहस सुलझाने पर हर बच्चे को एक जैसा ही फायदा होगा।

क्या झगड़े के बाद Sorry बोल देना काफी है?

Sorry बोलना अच्छी बात है। अगर माता-पिता ने बच्चे के सामने एक-दूसरे के साथ गलत Behaviour किया है, तो अपनी गलती मानना ज़रूरी हो सकता है। लेकिन अगर अगले दिन फिर वही झगड़ा, वही अपमान और वही पुराना Behaviour शुरू हो जाए, तो केवल Sorry बोलने से ज़्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। माफी के साथ व्यवहार में बदलाव आना भी ज़रूरी है। और यह भी याद रखना चाहिए कि माता-पिता के बीच होने वाली हर Private बहस बच्चे के सामने होना ज़रूरी नहीं है।

माता-पिता अपने झगड़ों के असर से बच्चों को कैसे बचा सकते हैं?

बच्चों को सुरक्षित रखने का मतलब यह नहीं कि माता-पिता कभी बहस ही न करें। इसका मतलब है कि वे अपनी असहमति की ज़िम्मेदारी खुद लें और पूरी कोशिश करें कि उनके Behaviour से बच्चे को बार-बार डर या Stress महसूस न हो।

Communication

कई बार झगड़ा इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि दोनों लोग सिर्फ अपनी बात कहने में लगे रहते हैं। एक व्यक्ति बोल रहा होता है और दूसरा उसकी बात समझने के बजाय यह सोच रहा होता है कि पलटकर जवाब क्या देना है। Raising Children Network भी सम्मान के साथ Communication करने, दूसरे की बात समझने और एक समय में एक ही मुद्दे पर चर्चा करने की सलाह देता है। इससे बातचीत को एक-दूसरे की कमियाँ निकालने के बजाय असली Problem पर फोकस रखा जा सकता है।

गुस्सा ज्यादा हो तो थोड़ा Break लें

अगर बातचीत के दौरान गुस्सा बढ़ रहा है, तो कुछ समय का Break लेना मददगार हो सकता है। इसका मतलब Problem से भागना नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि दोनों लोग शांत होकर बाद में उस मुद्दे पर दोबारा बात कर सकें। लेकिन याद रहे, इस Break का इस्तेमाल सामने वाले को चुप्पी से सज़ा देने के लिए नहीं करना चाहिए।

बच्चों का Daily Routine बनाए रखें

घर में Stress होने पर भी कोशिश करें कि बच्चे की पढ़ाई, खेल, सोने और खाने का समय ज़्यादा प्रभावित न हो। उसके साथ Quality Time बिताएँ और उसकी बात सुनें। एक Stable Daily Routine बच्चों को यह महसूस करने में मदद करता है कि घर में परेशानियाँ होने के बावजूद उनकी ज़िंदगी में कुछ चीजें सुरक्षित और पहले जैसी हैं।

बच्चे से उसकी Feelings के बारे में बात करें

हर बच्चा अपनी परेशानी खुद आकर नहीं बताता। कुछ बच्चे बाहर से बिल्कुल normal दिखते हैं, जबकि अंदर ही अंदर बहुत परेशान हो सकते हैं। इसलिए कभी-कभी बच्चे के पास बैठकर उससे प्यार से पूछना चाहिए कि वह घर के माहौल के बारे में कैसा महसूस करता है। अगर बच्चा कुछ बताता है, तो तुरंत उसे चुप कराने या उसकी बात को छोटी बताने के बजाय पहले उसकी पूरी बात सुनें। और सबसे ज़रूरी बात, उसे एक ऐसा भरोसा दें जो आपके Behaviour में भी साफ़ दिखाई दे।

Family Conflict और Domestic Violence में क्या अंतर है?

सामान्य मतभेद बनाम Family Violence

जब किसी रिश्ते में एक व्यक्ति दूसरे को डराने, धमकाने, शारीरिक नुकसान पहुँचाने या उसकी आज़ादी और Behaviour पर ज़बरदस्ती Control करने लगे, तो यह केवल सामान्य मतभेद नहीं रह जाता। Federal Circuit and Family Court of Australia के अनुसार, Family Violence में ऐसा हर Behaviour शामिल हो सकता है जिसका उद्देश्य दूसरे व्यक्ति पर Power और Control बनाए रखना हो।

सुरक्षा सबसे पहला कदम है

ऐसी Situation में केवल यह सलाह देना कि दोनों बैठकर आपस में बात कर लें, हमेशा सुरक्षित नहीं होता। अगर घर में Violence या किसी भी तरह का गंभीर खतरा मौजूद है, तो सबसे पहले प्रभावित व्यक्ति और बच्चों की Safety ज़रूरी है।

यहाँ से मिल सकती है मदद

  • भारत में किसी भी तत्काल खतरे की स्थिति में Emergency Number 112 पर संपर्क किया जा सकता है।
  • बच्चों की सुरक्षा और मदद के लिए Child Helpline 1098 पर भी कॉल की जा सकती है।

बच्चों के Behaviour में बदलाव होने पर Child Psychologist से कब मिलना चाहिए?

कभी-कभी माता-पिता अपने Behaviour में सुधार कर लेते हैं, लेकिन बच्चे की परेशानी तुरंत खत्म नहीं होती। अगर बच्चा लंबे समय तक डरा हुआ रहता है, अपनी पसंद की Activities से दूर रहने लगता है या उसकी नींद और School Performance लगातार प्रभावित हो रही है, तो किसी योग्य Child Psychologist से सलाह लेना मददगार हो सकता है।

इसी तरह, अगर बच्चा बार-बार खुद को माता-पिता के झगड़ों का ज़िम्मेदार बताता है या कहता है कि उसे घर में safe feel नहीं होता, तो उसकी बात को गंभीरता से लेना चाहिए। एक Child Psychologist बच्चे की उम्र, उसके Behaviour, पारिवारिक माहौल और दूसरी situations को समझकर सही मदद का सुझाव दे सकता है।

कुछ परिवारों में Parents Counselling या Family Counselling भी उपयोगी हो सकती है। लेकिन जहाँ Violence, धमकी या ज़बरदस्ती Control मौजूद हो, वहाँ सामान्य Couple Counselling हमेशा सुरक्षित विकल्प नहीं होती; ऐसी स्थिति में Safety को प्राथमिकता देकर ही Expert Help लेनी चाहिए।

Conclusion

पति-पत्नी के बीच मतभेद होना normal है, क्योंकि दो लोगों की सोच हमेशा एक जैसी नहीं हो सकती। लेकिन जब बहस रोज़ के झगड़ों, अपमान और नाराज़गी में बदल जाती है, तो इसका असर बच्चों पर पड़ने लगता है। कुछ बच्चे डरने लगते हैं, तो कुछ खुद को ही इन झगड़ों का ज़िम्मेदार मान बैठते हैं।

हालाँकि, हर बहस बच्चे को नुकसान पहुँचाए, यह ज़रूरी नहीं है। Child Psychology की Research बताती है कि माता-पिता जिस तरह अपने Conflicts को handle करते हैं, वह बहुत मायने रखता है। अगर वे सम्मान के साथ problems सुलझाते हैं, तो बच्चे भी रिश्तों को निभाना सीखते हैं।

सबसे ज़रूरी बात यह है कि बच्चों को कभी भी माता-पिता के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर न करें। रिश्तों को संभालना बड़ों की ज़िम्मेदारी है। बच्चों को एक ऐसे माहौल की ज़रूरत होती है जहाँ वे बिना किसी बोझ के safe feel कर सकें।

Disclaimer

यह आर्टिकल Child Psychology, Parenting और Mental Health के बारे में सामान्य जानकारी और Awareness देने के उद्देश्य से लिखा गया है। यहाँ बताए गए प्रभाव हर बच्चे में दिखाई दें, ऐसा जरूरी नहीं है। केवल Behaviour में बदलाव देखकर किसी बच्चे को Mental Health Condition होने का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। अगर बच्चा लंबे समय तक Stress, डर या Behaviour में गंभीर बदलाव का अनुभव कर रहा है, तो योग्य Mental Health Professional से सलाह लें। Domestic Violence या खतरे की स्थिति में उचित Safety Services की मदद लें।

 

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