doomscrolling रील देखने की लत का मानसिक नुक्सान

Doomscrolling

Table of Contents

Abstract 

सुबह बिस्तर से उठने के बाद सबसे पहली चीज जिस पर हमारा हाथ जाता है वो है मोबाइल, और मोबाइल पर हम news तो ऐसे ढूंढते हैं जैसे कोई जानकारी नहीं होने पर हमारा कोई बड़ा नुकसान हो जाएगा, पर news देखना और social media चलाना आजकल बहुत normal बात हो गई है। पर अक्सर ऐसा होता है कि हम सोचते हैं बस दो मिनट कुछ देख लेते हैं, और कब वो 2 मिनट घंटों में बदल जाते हैं पता ही नहीं चलता। स्क्रीन पर एक के बाद एक परेशान करने वाली खबरें आती रहती हैं और हम बस उन्हें लगातार पढ़ते चले जाते हैं। मन में अजीब सी anxiety होने लगती है, फिर भी फोन से पीछा छुड़ाना किसी लत से बचने के लिए की गई नाकाम कोशिश की तरह लगता है। इसी लत को doomscrolling कहते हैं।

ऐसा हम इसलिए करते हैं क्योंकि एक तो हर नया update जानने की जल्दी रहती है, ऊपर से हमारा दिमाग negative news की तरफ बहुत जल्दी खिंचा चला जाता है। Research में भी पाया गया है कि इस आदत से stress, anxiety और overthinking बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं। हालांकि, हर किसी पर इसका psychological well-being पर असर थोड़ा अलग हो सकता है।

इस लेख में हम इसी बारे में बात करेंगे कि doomscrolling क्या है, यह normal social media चलाने से कैसे अलग है, इससे हमारी सेहत पर क्या असर पड़ता है और इस आदत को कैसे manage किया जा सकता है।

Introduction

मोबाइल पर कोई खबर देखकर आप उसे खोलते हैं, पर तभी news, video और comments का ऐसा सिलसिला शुरू होता है जो हमारे brain पर इस तरह से हावी होता है कि हम मोबाइल छोड़ना तो चाहते हैं पर फिर बोलते हैं बस थोड़ी देर और, और वो थोड़ी देर कभी होती ही नहीं है। आप फोन रखने के बारे में सोचते हैं, पर नया update सामने आ जाता है। अचानक समय देखने पर पता चलता है कि पूरा घंटा बीत गया। इतनी जानकारी पढ़ने के बाद भी मन शांत होना तो दूर, बल्कि ज्यादा परेशान होने लगता है, और सुबह से ही negativity हमारे मन में अपनी जगह बना लेती है।

जानकारी रखना गलत नहीं है, पर समस्या तब होती है जब यह आदत बन जाए। American Psychological Association (APA) के मुताबिक, लगातार negative news देखने से तनाव बढ़ता है, फिर भी लोग updates चेक करते हैं। यह सिर्फ लत नहीं है, बल्कि इसके पीछे uncertainty को समझने की चाहत और digital platforms का algorithmic feed जिम्मेदार हैं।

doomscrolling क्या है और सामान्य scrolling से कैसे अलग है?

doomscrolling का मतलब केवल ज्यादा मोबाइल चलाना नहीं है। यह ऐसी आदत है जिसमें व्यक्ति लगातार डरावनी, परेशान करने वाली या negative news देखता रहता है, जबकि उससे दूर होना कठिन महसूस होता है। इसमें युद्ध, दुर्घटना, बीमारी, अपराध या आर्थिक संकट जैसी गंभीर घटनाएं शामिल हो सकती हैं। Cleveland Clinic की psychologist Susan Albers के अनुसार, इसमें व्यक्ति बार-बार नकारात्मक सामग्री देखता है, भले ही उसका मूड खराब हो रहा हो। कभी उसे लगता है कि अगले update से सब ठीक हो जाएगा, लेकिन हर बार एक नया सवाल सामने आ जाता है।

Normal Scrolling और Doomscrolling में क्या फर्क है? 

अगर normal scrolling से इसकी तुलना करें, तो सामान्य तौर पर व्यक्ति जानकारी, मनोरंजन या बातचीत के लिए social media इस्तेमाल करता है। इसके विपरीत, doomscrolling में नकारात्मक खबरों पर लगातार लौटना और उनसे अलग होने में कठिनाई होना सबसे बड़ा फर्क है। यहाँ व्यक्ति का झुकाव केवल परेशान करने वाली सामग्री की तरफ ही रहता है।

आधारNormal ScrollingDoomscrolling
उद्देश्यजानकारी या मनोरंजननकारात्मक Updates खोजना
Contentअलग-अलग प्रकार कापरेशान करने वाला Content
समयजरूरत के अनुसारअपेक्षा से अधिक हो सकता है
अनुभवअलग-अलग भावनाएंबेचैनी बढ़ सकती है
असरजरूरी नहीं कि परेशानी होनींद या काम प्रभावित हो सकते हैं

क्या हर नकारात्मक News पढ़ना Doomscrolling है?

किसी गंभीर घटना की जानकारी लेना उपयोगी हो सकता है। मौसम की चेतावनी, स्वास्थ्य संबंधी update या स्थानीय emergency की जानकारी सही फैसला लेने में मदद करती है। अंतर इस बात से समझा जा सकता है कि खबर पढ़ने के बाद आपको जरूरी जानकारी मिली या आप बिना किसी स्पष्ट उद्देश्य के लगातार परेशान करने वाली posts देख रहे हैं।

हम नकारात्मक खबरें बार-बार क्यों देखते हैं?

Uncertainty: हर नया Update जानने की जरूरत क्यों महसूस होती है?

जब कोई घटना हमारे नियंत्रण से बाहर हो तो हमें लगता है कि उसके बारे में जानकारी एकत्रित करना एक सुरक्षित कदम हो सकता है। किसी गंभीर बीमारी या प्राकृतिक आपदा की खबर आने पर लोग स्वाभाविक रूप से जानना चाहते हैं कि स्थिति कितनी गंभीर है, इसका हमारे जीवन पर किसी तरह का नुकसान तो नहीं होगा। लेकिन कभी यही जानकारी तलाशने की कोशिश लगातार updates देखने में बदल जाती है। Cadabam’s हॉस्पिटल के अनुसार, संकट के समय हर नई जानकारी जानने की इच्छा doomscrolling बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। और इससे हमारी mental condition पर भी बुरा असर पड़ता है।

Negativity Bias: बुरी खबरें ज्यादा ध्यान क्यों खींचती हैं?

हमारा दिमाग आने वाली बुरी खबरों पर ज्यादा ध्यान देता है, जिसे मनोविज्ञान में negativity bias कहा जाता है। किसी सामान्य खबर की तुलना में आपको खतरे वाली खबरें ज्यादा आकर्षित करती हैं, क्योंकि खतरा पहचानना हमारी सुरक्षा से जुड़ा है। लेकिन जब digital feed लगातार ऐसी सामग्री दिखाती है, तो व्यक्ति का ध्यान बार-बार नकारात्मक घटनाओं पर जा सकता है। और हम बिना किसी वजह के परेशान हो जाते हैं।

सनसनीखेज Headlines कैसे असर डालती हैं?

कुछ headlines जानबूझकर इसलिए लिखी जाती हैं ताकि आपको डराया जा सके। लोग दिमाग के cognitive bias के पैटर्न को समझते हैं, जिनमें बड़े दावे होते हैं, पर पूरी जानकारी नहीं होती। कभी किसी घटना का सबसे गंभीर पहलू दिखाया जाता है, जबकि बाद में पता चलता है कि ये जानकारी उतनी ज्यादा परेशान करने वाली थी ही नहीं जितना बढ़ा-चढ़ाकर उसे बताया गया है। सोशल मीडिया के recommendation systems भी users के व्यवहार के आधार पर मिलती-जुलती सामग्री दिखाते हैं, जिसमें किसी एक बुरी खबर को बार-बार दिखाया जा सकता है ताकि आप उसे पढ़ें।

गलत जानकारी से चिंता कैसे बढ़ती है?

social media पर हर viral post सही नहीं होती। कभी आप देखते होंगे कि अलग-अलग pages पर वो खबर कई तरीकों से दिखाई जा सकती है, तो कभी किसी research का केवल एक हिस्सा दिखाकर बड़ा दावा कर देते हैं। ऐसी जानकारी व्यक्ति को वास्तविक परिस्थिति से अधिक खतरा महसूस करा सकती है, और फिर वह सच्चाई जानने के लिए दूसरी posts खोजता है। इस तरह गलत जानकारी, डर और लगातार scrolling का चक्र बन सकता है।

कैसे पहचानें कि आपकी Scrolling, Doomscrolling बन चुकी है?

पांच मिनट का ब्रेक कब एक घंटे में बदल जाता है?

इसे सुधारने के लिए हम समय पर ध्यान देने से शुरुआत कर सकते हैं। आप कुछ देर के लिए अपना फोन निकालते हैं और जब रखते हैं तो हमें पता चलता है कि बहुत देर हो गई है, तो अपनी आदत समझना उपयोगी हो सकता है। हालांकि केवल अधिक screen time होना doomscrolling का प्रमाण नहीं है, हमारे मोबाइल के इस्तेमाल करने के तरीके को भी देखना जरूरी है। कभी-कभी हमारा screen time कुछ जरूरी कामों से भी बढ़ता है।

बार-बार Feed Refresh करने की आदत 

कभी कोई नया update नहीं होता, फिर भी व्यक्ति news app खोलकर देखता रहता है, बार-बार किसी नई खबर के लिए refresh करता रहता है। यह व्यवहार धीरे-धीरे आदत बन जाता है, खासकर जब खाली समय मिलते ही बिना सोचे मोबाइल खोलने की इच्छा होने लगे।

बंद करना चाहते हैं, लेकिन रुक नहीं पाते

एक महत्वपूर्ण संकेत तब दिखाई देता है जब व्यक्ति जानता है कि लगातार नकारात्मक खबरें देखने से उसका मूड खराब हो रहा है, फिर भी वह scrolling को रोक नहीं पाता। इस अनुभव को पहचानना उपयोगी है, क्योंकि हर आदत बदलने की शुरुआत उसके व्यवहार को समझने से होती है।

Distraction: जब जरूरी काम पीछे छूटने लगें

लगातार मोबाइल देखने से पढ़ाई, ऑफिस के काम या दूसरे जरूरी कामों के बीच ध्यान भटक सकता है। कभी परिवार के साथ बैठने के दौरान भी व्यक्ति बार-बार news चेक करता रहता है। यदि ऐसा व्यवहार रोजमर्रा की जिम्मेदारियों को प्रभावित कर रहा है, तो डिजिटल सीमाओं की जरूरत हो सकती है।

मोबाइल बंद करने के बाद कैसा महसूस होता है?

अपने मूड में बदलाव पर ध्यान दें। क्या news देखने से पहले आप शांत थे, लेकिन बाद में बेचैनी बढ़ गई? क्या वही खबर बार-बार दिमाग में लौट रही है? क्या दूसरे कामों पर ध्यान देना कठिन लग रहा है? इन सवालों से अपनी आदत को समझने में मदद मिल सकती है।

normal scrolling से भी आपका retention, मतलब ध्यान देने की क्षमता, प्रभावित हो जाता है। लगातार short-form content देखते रहने से हमारा किसी काम या बात पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित कर पाना मुश्किल हो जाता है। इसलिए केवल doomscrolling ही नहीं, हमें normal overscrolling से भी बचना चाहिए।

Doomscrolling हमारी Mental Health को कैसे प्रभावित करती है?

Anxiety: खबर खत्म, लेकिन चिंता जारी

खबरें पढ़ने के बाद व्यक्ति उनके बुरे नतीजों के बारे में सोचता रहता है और उन बातों को सच मानकर उनके बारे में बुरा महसूस करता है। 2026 की एक study में doomscrolling का सीधा संबंध anxiety, depression और psychological distress से पाया गया है, जो इंसान को मानसिक रूप से परेशान करते हैं।

Stress: जब जानकारी मानसिक बोझ बनने लगे

जब आप लगातार बुरी बातों के बारे में सोचते हैं तो आपके दिमाग में आपके चारों ओर एक negativity का जाल बनने लगता है। जब बहुत ज्यादा जानकारी सामने आती है, तो दिमाग तय नहीं कर पाता कि किस पर ध्यान दे। इसे information overload कहते हैं, जो केवल तनाव बढ़ाता है। और ज्यादातर यह जानकारी हमारे काम की भी नहीं होती।

Negativity: दुनिया पहले से ज्यादा खराब क्यों लगने लगती है?

जब हम लगातार सिर्फ negative खबरें देखते हैं, तो दुनिया बहुत असुरक्षित और डरावनी लगने लगती है। इससे मन में उदासी और बेबसी बढ़ती है, हालांकि व्यक्ति के अपने निजी अनुभव भी उसकी सोच तय करते हैं।

Overthinking: जब News दिमाग से नहीं निकलती

लगातार scrolling करने के बाद जब आप फोन बंद करते हैं उसके बावजूद भी हमारे दिमाग में वे खबरें घूमती रहती हैं और हमारा मन भी सोचता रहता है कि ‘आगे क्या होगा?’। संभावित खतरों के बारे में बार-बार सोचना overthinking बढ़ाता है, जिससे बिना वजह केवल मानसिक बेचैनी पैदा होती है।

पहले से मानसिक परेशानी हो, तो क्या असर बढ़ सकता है?

जो लोग पहले से anxiety या depression से जूझ रहे हैं, उन पर negative news का असर ज्यादा बुरा हो सकता है। ऐसे में social media छोड़ना जरूरी नहीं है, बल्कि सीमाएं तय करना बेहतर तरीका है।

क्या Doomscrolling शरीर को भी प्रभावित कर सकती है?

Sleeplessness: रात में नींद क्यों प्रभावित होती है?

रात में सोने का समय होने के बाद भी हम मोबाइल चलाते हुए 5 मिनट और बोलकर सोने के समय को टालते रहते हैं। यदि व्यक्ति परेशान करने वाली news पढ़ रहा है, तो उससे पैदा हुई बेचैनी भी आराम करने में कठिनाई बढ़ा सकती है। इसलिए रात की scrolling में समय और content, दोनों महत्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन sleeplessness के कई कारण होते हैं, हर नींद की समस्या को doomscrolling से जोड़ना सही नहीं है।

खानपान और Daily Routine में बदलाव

जब हम लंबे समय तक मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं तो हम जरूरी काम जैसे भोजन, घूमना या दूसरे काम छोड़ देते हैं। कुछ लोग खाना खाते समय भी लगातार videos या news देखते रहते हैं। यह जरूरी नहीं कि सभी लोगों में ऐसा व्यवहार नुकसानदायक हो, लेकिन यदि सामान्य दिनचर्या प्रभावित होने लगे तो उस पर ध्यान देना उपयोगी है।

Physical Inactivity: जब चलना-फिरना कम हो जाए

लगातार बैठकर scrolling करते रहने से व्यक्ति अपनी आदतों को भी बिगाड़ लेता है और physical activities को पूरी तरह से avoid करता है। यदि व्यक्ति का अधिकांश दिन पहले से बैठकर गुजरता है, तो मोबाइल का अतिरिक्त इस्तेमाल निष्क्रिय समय बढ़ाने का काम करता है। इसलिए दिन में नियमित रूप से उठना और शरीर को सक्रिय रखना सामान्य स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है।

गर्दन और आंखों की परेशानी

लंबे समय तक मोबाइल नीचे देखकर इस्तेमाल करने से गर्दन और कंधों में असहजता हो सकती है। लगातार स्क्रीन देखने से कुछ लोगों को आंखों में थकान या सूखापन महसूस हो सकता है। ये समस्याएं सामान्य screen use के साथ भी दिखाई दे सकती हैं, इसलिए इन्हें केवल doomscrolling का प्रभाव नहीं मानना चाहिए।

सोशल मीडिया सबको एक जैसा प्रभावित क्यों नहीं करता?

हर व्यक्ति की Mental Health अलग होती है

एक ही news दो लोगों को अलग-अलग तरह से प्रभावित कर सकती है। किसी के लिए वह सामान्य जानकारी है, तो किसी दूसरे के लिए पुराने परेशान करने वाले अनुभव से जुड़ी हो सकती है। उम्र, जीवन की परिस्थितियां, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सहयोग जैसी बातें इन प्रतिक्रियाओं को प्रभावित कर सकती हैं।

किस तरह की News देखते हैं, यह भी महत्वपूर्ण है

किसी जरुरी खबर को पढ़ना उसके बारे में देखना अलग बात है और किसी वायरल पोस्ट को बार बार देखना अलग बात है  । News की गुणवत्ता, उसका संदर्भ और उसे देखने का उद्देश्य महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए केवल कुल screen time देखकर किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

क्या सोशल मीडिया ही Anxiety का कारण है  

mental health पे बहुत सारी चीज़ो से असर पढ़ता है। नींद, आर्थिक स्थिति, रिश्ते, काम, शारीरिक स्वास्थ्य और पुराने अनुभव भी महत्वपूर्ण हैं। 2026 की systematic review ने doomscrolling और खराब mental health outcomes के बीच संबंध पाया, लेकिन शोध में कारण और परिणाम स्थापित नहीं हुए। इसलिए केवल यह कह देना कि social media के कारण ही मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ा है, यह कहना गलत होगा।

Doomscrolling कैसे रोकें? अपनी Scrolling पर नियंत्रण के तरीके

  • News का समय तय करें: दिनभर बार-बार updates देखने के बजाय सुबह और शाम को news पढ़ने का एक निश्चित समय चुनें, ताकि जरूरी जानकारी भी मिले और समय भी बचे।
  • Timer का इस्तेमाल करें: Scrolling करते समय समय का अंदाजा नहीं रहता, इसलिए मोबाइल में 10-15 मिनट का timer लगाएं। APA भी screen-free time और सीमित notifications की सलाह देता है।
  • सुबह और रात की Scrolling घटाएं: सुबह उठते ही नकारात्मक news देखने से बचें और रात को सोने से पहले स्क्रीन से दूर रहें। WHO भी बेहतर नींद के लिए electronic devices का इस्तेमाल सीमित करने की सलाह देता है।
  • Notifications बंद करें: बार-बार आने वाले news alerts ध्यान भटकाते हैं, इसलिए गैरजरूरी notifications को बंद रखें ताकि हर नई headline पर तुरंत मोबाइल खोलने की आदत छूटे।
  • भरोसेमंद Sources चुनें: सोशल मीडिया की viral posts के बजाय भरोसेमंद स्रोतों से पूरी खबर पढ़ें। एक अच्छी और सटीक रिपोर्ट पढ़ना दर्जनों अधूरी जानकारी वाली posts से कहीं बेहतर है।
  • बेचैनी होने पर Break लें: News पढ़ते समय अगर मानसिक तनाव या बेचैनी बढ़ने लगे, तो तुरंत स्क्रीन से दूरी बना लें। यह तय करना जरूरी है कि आपके लिए फिलहाल कितनी जानकारी पर्याप्त है।

मोबाइल से दूर होने के बाद क्या करें और कब मदद लें?

Walking: कुछ समय स्क्रीन से बाहर भी बिताएं

मोबाइल को खुद से थोड़ा दूर करें। Walking से शरीर थोड़ा एक्टिव होता है जिससे हम महसूस कर पाते है की हमारे आसपास भी एक दुनिया है जो की इतनी बुरी नहीं है जितना वास्तव में बुरी खबरों में दिखाया जाता हैं । यह हर चिंता को तुरंत तो खत्म नहीं करता, पर लगातार scrolling के बीच एक हेल्दी विकल्प जरूर देता है।

Reading और Writing से ध्यान बदलें

आप मोबाइल से खुद को दूर करने के लिए खुदको दूसरी activites जैसे किताब पढ़ना, कोई sports में participate करना, अपने विचार को लिखना। अगर कोई news परेशान कर रही है, तो उससे जुड़े विचार लिखकर देखें। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि कौन-सी बात हकीकत है और कौन-सी सिर्फ एक आशंका।

Mindfulness: हर विचार पर reaction देना जरूरी नहीं

Mindfulness में वर्तमान पर ध्यान दिया जाता है, जैसे सांसों या आसपास की आवाज़ों को महसूस करना। जब नेगेटिव विचार आएं, तो उन्हें सच मानने के बजाय सिर्फ एक विचार की तरह देखें। यह तरीका फायदेमंद है, पर किसी मानसिक समस्या का इकलौता इलाज नहीं है।

परिवार और दोस्तों से बातचीत करें

सोशल मीडिया के अलावा व्यक्तिगत बातचीत का अपना अलग महत्व है। परिवार के साथ समय बिताने या किसी दोस्त से अपनी चिंता शेयर करने से इमोशनल सपोर्ट मिलता है। हर बातचीत में सिर्फ दुनिया की नकारात्मक खबरें ही शामिल हों, यह जरूरी नहीं है।

चिंता को उपयोगी Action में बदलें

परेशान करने वाली news देखकर कभी-कभी बेबसी महसूस होती है। ऐसे में और खबरें पढ़ने के बजाय कोई छोटा कदम उठाएं, जैसे किसी राहत अभियान की मदद करना या सही जानकारी फैलाना। APA भी केवल खबरें देखने के बजाय सकारात्मक एक्शन लेने का सुझाव देता है।

Professional Help कब लेनी चाहिए?

अगर scrolling की वजह से नींद, काम या मेंटल हेल्थ पर लगातार बुरा असर पड़ रहा है, और anxiety या उदासी बनी रहती है, तो mental health professional से सलाह लें। इसका मतलब यह नहीं कि फोन चलाने वाला हर इंसान बीमार है, बल्कि समय पर मदद लेना समझदारी है।

Conclusion: 

दुनिया में हर समय कुछ न कुछ घटित होता रहता है, पर हर नई घटना के update को हम लगातार देखते रहे यह जरुरी तो nhi। Doomscrolling को समझने के बाद साफ होता है कि समस्या मोबाइल चलाने में नहीं, बल्कि उस आदत में है जो जानकारी पाने की चाहत को लगातार negative content देखने में बदल देती है। इसका संबंध anxiety, stress, overthinking और wellbeing से हो सकता है, लेकिन अलग-अलग अनुभव हो सकते हैं। इसलिए लक्ष्य social media को पूरी तरह छोड़ना नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल अपनी जरूरत के अनुसार करना होना चाहिए। दुनिया के बारे में जागरूक रहने के साथ-साथ हमें अपनी mental health का भी ध्यान रखना चाहिए। कभी-कभी मोबाइल बंद करना किसी जरूरी बात को नजरअंदाज करना नहीं, बल्कि अपने समय, ध्यान और मानसिक सुकून को महत्व देना होता है।

Disclaimer

यह लेख केवल सामान्य जानकारी और Mental Health Awareness के लिए लिखा गया है। यह किसी चिकित्सकीय जांच, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। Doomscrolling अपने आप में अलग औपचारिक Mental Disorder नहीं है। सोशल मीडिया के मानसिक और शारीरिक प्रभाव हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। यदि लगातार Anxiety, उदासी, Sleeplessness या दैनिक जीवन में कठिनाई महसूस हो, तो योग्य डॉक्टर या Mental Health Professional से सलाह लें।

 

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